सबरीमाला : टूटती परंपराओं के बीच महेंद्रन, चंद्रिका और जयमाला को जानना जरूरी है

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भगवान अयप्पा और सबरीमाला मंदिर (कान्सेप्ट इमेज)।

पटना। आज जब अहले सुबह भगवान अयप्पा के मंदिर में दो महिलाओं ने प्रवेश कर पूजा किया तो यह कहा जाने लगा कि आठ सौ साल की पुरानी परंपरा टूट गई है सबरीमाला मंदिर में। पर, आपको बता दें कि यह तीसरा मौका है, जब यह परंपरा टूटी है। महिलाओं ने मंदिर परिसर में प्रवेश किया और पूजा भी की।

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आठ सौ साल पुराने इस मंदिर में 1990 में ही महिलाओं के प्रवेश की बात सामने आई थी। तब यह मामला एक शख्स एस महेंद्रन ने उठाया था। महेंद्रन केरल के कोट्टायम जिले की एक लाइब्रेरी का सचिव था। वह केरल में प्रकाशित होनेवाले सभी मुख्य अखबारों को पढता भी था। अखबार में छपी एक तस्वीर पर उसकी नजर ठहर गई। उस तस्वीर में एक महिला थी, जिसका नाम था चंद्रिका। यह महिला तब केरल में मंदिरों की देखरेख करने वाली संस्ता देवस्वम की आयुक्त थीं। उस तस्वीर में चंद्रिका की नातिन के अन्नप्राशन की तस्वीर थी। उस तस्वीर में उक्त बच्ची की मां भी थी, जो 25 वर्ष के आसपास की उम्र की थी। यह कार्यक्रम भगवान अयप्पा के मंदिर में हुआ था।

भगवान अयप्पा का मंदिर।

जब यह मामला सुर्खियों में आने लगा तब कन्नड़ एक्ट्रेस जयमाला ने दावा किया कि 1987 में वे मंदिर के गर्भगृह में गई थीं और प्रतिमा को छुआ भी था। यह सब तब हुआ, जब वे एक फिल्म की शूटिंग कर रही थीं। तब जयमाला की उम्र 28 साल की थी। इसके बाद एकबार फिर से मंदिर प्रबंधन ने शुद्धिकरण किया। केरल सरकार ने क्राइम ब्रांच को मामले की जांच भी सौंपी थी। पर, नतीजा कुछ नहीं निकला और जांच एकाएक ही बंद कर दी गई।

इसके बाद से 2019 में दो जनवरी का दिन है, जब इस मंदिर परिसर में दो महिलाएं आईं और भगवान अयप्पा की पूजा की है। इसके बाद से एकबार फिर से व्यस्थापकों ने मंदिर के कपाट को बंद कर दिया। शुद्धिकरण किया और फिर जाकर कपाट खोले। एकबार फिर से भगवान अयप्पा की पूजा शुरू हो गई है।

थोड़ा पीछे चलते हैं 1990 में। आज से 28 साल पहले महेंद्रन की याचिका पर केरल हाइकोर्ट ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को उचित बताया और इसे जारी रखा। केरल हाइकोर्ट के फैसले पर 2006 में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी गई। तब से ही यह मामला सुर्खियों में आने लगा था। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर सुनवाई के दौरान महिलाओँ के प्रवेश पर लगी रोक को गलत करार दिया था। पिछले कुछ दिनों से ऐसी कोशिशें लगातार चल रही थीं, पर आज जाकर महिलाओं को सफलता मिली।

आइए जानते हैं कि आखिर यह रोक क्यों लगी है। कहा जाता है कि स्वामी अयप्पा को ब्रह्मचारी माना जाता है। आधिकारिक तौर पर कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं है कि महिलाएं उनकी पूजा नहीं कर सकती हैं। हां, उसमें उम्र की बात का उल्लेख नहीं है। दरअसल, सबरीमाला मंदिर में प्रवेश के जो नियम हैं, वे इतने कठोर हैं कि उसके कारण ही महिलाओं का प्रवेश रोक दिया गया है। क्योंकि, जिस उम्र की शुरुआत से लेकर अंत तक चर्चा है, उसमें उन नियमों का पालन नहीं हो सकता है।

इस मंदिर के भीतर जाने के लिए 18 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। नियमानुसार उन पर चढ़ने के पहले कुछ कठोर नियमों का पालन करना अनिवार्य है। जो भी इस पर चढ़ना चाहता है, उसे 41 दिनों तक कठिन व्रत रखेगा। जिसके तहत खाने-पीने, सोने-उठने और भोजन के नियम हैं। तीर्थयात्री काले या नीले रंग के ही कपड़े पहनते हैं। महिलाएं हर माह में रजस्वला होती हैं, जिसके कारण वे उन नियमों का पालन नहीं कर पाती हैं।

इसलिए जब वे मंदिर की सीढ़ियां ही चढ़ने के नियमों का पालन नहीं कर पाती हैं तो फिर पूजा कैसे कर सकेंगी। दूसरी ओर, पुरुषों को भी 41 दिन तक दाढ़ी नहीं बनानी पड़ती है। सहवास समेत अन्य नियमों का भी पालन करना पड़ता है। आप समझ सकते हैं कि प्राकृतिक कारणों से महिलाओं का प्रवेश वंचित हो जाता है, न कि किसी धर्मार्थ या शास्त्रीय कारणों से। बाद में इसे परंपरा मान लिया गया।

जब भी कोई महिला किसी भी कारण से यहां प्रवेश कर जाती हैं तो मंदिर को शुद्ध किया जाता है। इसके खिलाफ ही 2006 में इंडियन यंग लॉयर एसोसिएशन ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी। याचिका में भेदभाव को हटाने की मांग के तहत ही प्रतिबंधों को हटाने की बात कही गई। तर्क था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक छुआछूत का रूप है। संविधान के अनुच्छेद-17 का उल्लंघन है।

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इसके बाद 2007 में केरल की लेफ्ट डेमोक्रेटिक सरकार ने यंग लॉयर एसोसिएशन के समर्थन में सुप्रीम कोर्ट में शपथ-पत्र दिया था। बाद में जब केरल में सरकार बदली तो वह महिलाओं के प्रवेश से संबंधित हलफनामे से पलट गई। बाद में जब लेफ्ट लीडेड सरकार बनी तो फिर से महिलाओं के प्रवेश के समर्थन में दिये गये शपथ-पत्र की बात दोहराई गई। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे संविधान पीठ को सौंप दिया। जुलाई 2018 में पांच जजों की बेंच ने इस पर कहा कि हर उम्र की महिला केरल के सबरीमाला मंदिर में प्रवेश कर सकती है।

कोर्ट ने यह माना कि सबरीमाला में महिलाओं को गैर-धार्मिक कारणों से प्रतिबंधित किया गया है, जो भेदभाव का नतीजा है। ऐसे में समानता के नाम पर यह अनुचित है और महिलाओं के पीरियड्स को लेकर जो प्रतिबंध लगाए गए हैं, वह उनकी गरिमा के खिलाफ हैं। संविधान पीठ में शामिल एकमात्र महिला जस्टिस इन्दु मल्होत्रा का फैसला अलग था। उन्होंने इसे सती प्रथा जैसी कुरीतियों के साथ इसे रखना अनुचित समझा था।

(बिहार डेस्क प्रस्तुति)

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