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पाटलिपुत्र की लोकसभा सीट को लेकर एकबार फिर से राजद में घमासान मचा हुआ है। थोड़ा पीछे जाएं और याद करें 2014 का लोकसभा चुनाव। तब राजद सुप्रीमो जेल में नहीं थे। उनकी बेटी मीसा चाहती थीं कि वे पटना की सीट से लोकसभा चुनाव लड़ें। इस पर रामकृपाल पहले से सांसद थे। पहले तो लालू बात को घुमाते-फिराते रहे और अंत में जब मीसा को टिकट दे दिया तो रामकृपाल यादव ने भाजपा का दामन थाम लिया। मुकाबला हुआ और मीसा की पराजय हुई। एक और यादव-लैंड लालू के हाथ से निकल गया था।

एकबाऱ फिर से उसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। तीन दिन पहले राजद विधायक और प्रवक्ता के साथ-साथ बड़े नेता भाई वीरेंद्र ने मनेर में कहा- यदि पार्टी चाहेगी तो वे इसबार पाटलिपुत्र सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ेंगे। मतलब साफ था कि मनेर से राजद विधायक वीरेंद्र ने अपनी लाइन स्पष्ट कर दी थी। ठीक उसके बाद जनता दरबार में बैठे लालू के बेटे और महुआ से विधायक तेजप्रताप यादव ने कहा- भाई वीरेंद्र की औकात ही क्या है। वहां से मीसा दीदी ही चुनाव लड़ेंगी। वे महिला हैं और लगातार काम कर रही हैं। यही नहीं, तेजप्रताप ने मीसा भारती का चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया।

अब बारी भाई वीरेंद्र की थी। मीडिया के साथ बात करते हुए तेजप्रताप यादव के बयान पर कहा- मेरे नेता और आदर्श लालू प्रसाद जी हैं। तेजस्वी मेरे नेता हैं और जो भी लालू जी का आदेश होगा, उसका पालन किया जाएगा। तेजप्रताप का नाम नहीं लिया, लेकिन यह जरूर कहा- छोटी-मोटी बातों पर मैं प्रतिक्रिया नहीं देता हूं।

कुछ इसी तरह का माहौल 2014 में था, जब रामकृपाल यादव भी अंत तक लालू प्रसाद को अपना नेता मानते रहे थे। आखिर में जब लालू ने मीसा के फेवर में फैसला दिया तो वे भाजपा में शामिल हुए। मीसा का मुकाबला किया और उनको हराया भी। उसके पहले यह कहा जाता था कि लालू यदि राजद के राम हैं तो रामकृपाल उनके हनुमान। हालांकि, उनकी तरह तो भाई वीरेंद्र न तो ताकतवर हैं और न ही भरोसेमंद, तो फिर इस बात की क्या गारंटी है कि जब लालू रामकृपाल की बात को काटते हुए मीसा का नाम फाइनल कर सकते हैं तो फिर भाई वीरेंद्र कहां जाएंगे।

(बिहार डेस्क प्रस्तुति)

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