वाह रहे प्रो. नौडियाल, तुच्‍छ से सरकारी मकान के लिए त्याग दिया कुलपति का पद

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  • राज्यपाल ने आखिरकार इस्तीफा किया मंजूर
  • हाय रे पहाड़, तेरी किस्मत ही कुछ ऐसी है क्या!

कुमाऊं विश्वविद्यालय के कुलपति यानि वाइस चांसलर प्रो. डीके नौडियाल का इस्तीफा आज राज्यपाल बेबी रानी मौर्य ने मंजूर कर लिया। गजब की बात यह है कि कुलपति प्रो. नौडियाल ने इस्तीफा महज इसलिए दे दिया कि उन्हें आईआईटी रुड़की स्थित अलाट किया गया मकान खाली करना पड़ रहा था। इस बात पर हंसे या रोएं कि एक ओर हमारे नौजवान देश की रक्षा के लिए अपना सर्वोच्च बलिदान दे रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर प्रो. नौडियाल जैसे बुद्धिजीवी व विलक्षण प्रतिभा के धनी महज दो टके के मकान के लिए कुमाऊं विवि के बच्चों को अच्छी एजुकेशन व संस्कार देने से वंचित कर रहे हैं।

यह ठीक है कि प्रो. नौडियाल की पत्नी नहीं हैं और उनकी बेटियां हैं, लेकिन बेटियां बड़ी हो चुकी हैं। उत्तरा पंत और डी के नौडियाल की कहानी में अंतर है। उत्तरा मात्र एक शिक्षिका थी, उसकी सोच सीमित थी, लेकिन प्रो. नौडियाल ने तो स्वार्थ की इंतहा कर दी। मैं मानता हूं कि प्रो. नौडियाल एक अच्छे इन्सान और आईआईटी के एक अच्छे प्रोफेसर गिने जाते हैं, बहुत ही मीठा बोलते हैं, लेकिन उन्हें यह भी तो सोचना चाहिए था कि यह धरती गुरु द्रोण की है। यहां गुरु द्रोण की पत्नी कृपि ने अपने बेटे अस्वाथामा को आटा घोलकर पिलाया और कहा, बेटे गाय का दूध ऐसा होता है। समझ में नहीं आता कि आज के गुरुओं को क्या हो गया है? जब गुरु ही त्याग नहीं कर सकता है तो शिष्य से नैतिकता और संस्कारों की बात किस मुंह से करेगा। वैसे भी प्रो. नौडियाल को वीसी का टर्म पूरा करने के बाद आईआईटी लौटना ही था। कुछ समझ में नहीं आ रहा कि क्या कहें, किसे कहें। सरकार से तो वैसे भी कोई अपेक्षा नहीं है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

हकीकत या फसाना – मरीना डूब रही थी और डीएम छोले-भटूरे खा रही थी?

 

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