शाबास त्रिवेंद्र, शाबास! तुम माटी के सच्चे लाल निकले

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  • बेचो, पहाड़ को बेचो ताकि पेड़ों की जगह कीचड़ हो और उस कीचड़ में तुम जैसे कमल खिल सकें
  • पहाड़ बचाने निकले थे, पहाड़ बेच डाला निर्भगी

त्रिवेंद्र जब सीएम बने तो पूरा पहाड़ खुश हुआ कि खैरासैंण का सूरज विकास के रूप में पहाड़ में चमकेगा, लेकिन अफसोस खैरासैंण के सूरज पर भूमाफिया का ग्रहण लग गया। औद्योगिक सलाहकार केएस पंवार भी पहाड़ में छोटे-छोटे उद्योग लगाने के पक्षधर थे और जब से उन्होंने इनवेस्टर्स सम्मिट की, तो उनके सुर बदल गए।

डा. पंवार की जो भूमिका थी उसके बदले में वो सीएम त्रिवेंद्र रावत के साथ मिलकर पहाड़ बेचने की साजिश में शामिल हो गए। हाल में जो कैबिनेट ने पहाड़ की भूमि को बेचने के लिए प्रस्ताव पारित किया है उसमें केएस पंवार का हाथ हो सकता है। क्योंकि उनकी नजरें भी पहाड़ की जमीन पर गढ़ी हुई हैं। यदि केएस पंवार पहाड़ के सच्चे हितैषी होते तो वो सीएम को औद्योगिक विकास के नाम पर कतई इस तरह की सलाह नहीं देते।

यदि उनका सीएम और उनकी भूमाफिया के साथ गठजोड़ करने वाली कैबिनेट में कोई भूमिका नहीं है तो उन्हें तुरंत औद्योगिक सलाहकार के पद से इस्तीफा दे देना चाहिए। और सीएम त्रिवेंद्र को तो वैसे भी पहला और आखिरी मौका मिला है और वे जीवन में दोबारा तो सीएम नहीं बन पाएंगे, क्योंकि उनसे कमजोर सीएम आज तक के इतिहास में कोई नहीं हुआ, इसलिए वे पहाड़ की बर्बादी का इतिहास लिख रहे हैं। शाबास, त्रिवेंद्र लिखो, खूब लिखो ऐसा इतिहास। जमींदारी उन्मूलन अधिनियम में बदलाव कर पहाड़ बेचने की फिराक में हो? देखना, हम पहाड़ी तुम्हारे नापाक इरादों को सफल नहीं होने देंगे। खबरदार।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

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