आखिर क्यों कांपती है सीएम त्रिवेंद्र की एक टांग?

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  • आत्मविश्वास की कमी या…?
  • सूर्यधार मामले में जनता को जवाब दें सीएम साब

मैंने तय किया था कि अगले 20 दिन मैं सोशल मीडिया से दूर रहूंगा क्योंकि मुझे लोगों ने विगत दो महीने में एक लाख से भी अधिक बार कोसा और गालियां दी। चूंकि कोई घटिया वस्तु मैं नहीं लेता, इसलिए मैंने वो गालियां उन सब महाशयों को सादर वापस लौटा दी। दरअसल, चुनाव के चक्कर में कई अवांछनीय तत्व मेरी फेसबुक पर घुस आए थे। उनमें से अधिकांश को मैंने हटा दिया है।

खैर, बात चुप रहने की थी। लेकिन जब सभा में द्रोपदी का चीरहरण हो रहा हो, तो कम से कम मैं द्रोणाचार्य या पितामह भीष्म नहीं बन सकता। सो, संकल्प किसी शराबी की तर्ज पर टूट गया। शराबी रात को संकल्प करता है और दोपहर होते-होते उसका संकल्प कमजोर हो जाता है और उसके कदम फिर ठेके की ओर बढ़ जाते हैं।

सीएम त्रिवेंद्र जो बेहद ईमानदार होने का दंभ भरते हैं और पहाड़ियों से दूर रहते हैं। गुप्ता, झा, सिंह, अनंत अम्बानी आदि-आदि उनके दोस्त हैं। दो साल में अपने गांव की तीन किलोमीटर की सड़क नहीं बना सके। गांव के स्कूल में टीचर नहीं नियुक्त कर सके, सतपुली के जिस स्कूल में पढ़े वहां एक प्रधानाचार्य नहीं रख सके। क्या करें हम सीएम की ईमानदारी को चाटें। जीरो टोलरेंस की बात होती है, लेकिन दिखता नहीं। उमेश के स्टिंग की सच्चाई की जांच होनी चाहिए। राजनीति में नैतिकता तो रही नहीं, ऐसे में सीएम से इस्तीफा मांगना तो बेकार है। पर जवाब तो मांगा जा सकता है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

पुनश्च: धधकता पहाड़ का अंतिम भाग: यदि वनों पर हमारा हक नहीं है तो हमारा हक कहां है?

 

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