बुरा न मानो होली है! पीएम की कुर्सी के लिए अभी अनफिट हैं राहुल

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photo source: ANI
  • राहुल गांधी का देहरादून में स्वागत
  • पप्पू की छवि मिटाने में लगेंगे पांच साल और

बात 2008 की है। उन दिनों मैं दिल्ली में नवभारत टाइम्स में था। राहुल गांधी विदर्भ के जालका गांव की कलावती से मिले। कलावती एक किसान की पत्नी है। उसके पति ने 2005 में कर्ज के बोझ तले दबने से आत्महत्या कर ली थी। राहुल ने कलावती की बात संसद में उठाई। कलावती सुर्खियां बन गई। मैंने राहुल गांधी का मैच्योर रूप देखा। लगा, कलावती की किस्मत बदलेगी। सुलभ इंटरनेशनल ने तो कलावती की मदद की पर कांग्रेसियों ने नहीं। कांग्रेस के नेता कलावती के साथ फोटो खिंचाने तो पहुंच गए, लेकिन कलावती की कोई मदद नहीं की। हालांकि सुलभ की मदद से आज कलावती 6 एकड़ भूमि ठेके पर लेकर कपास की खेती कर रही है, लेकिन मुसीबतें तो वैसी ही हैं। गत वर्ष उसकी एक और बेटी पपिता रामटेके ने भी कुएं में कूदकर जान देने की कोशिश की।

कलावती

बहरहाल, मैंने पिछले तीन घंटे तक राहुल गांधी की खूबियों और कमियों पर गौर किया। निश्चित तौर पर भाजपा ने उन्हें पप्पू की उपाधि देकर जनता के बीच गलत छवि बनाने का काम किया। मोदी मीडिया ने इसमें अहम भूमिका अदा की। लेकिन राहुल खुद भी इसके लिए दोषी हैं। संसद में आंख मारना वायरल हो गया तो आलू से सोना निकलने की बात हजम नहीं होती। फिर भी राहुल धीरे-धीरे एक सधे हुए नेता के तौर पर उभर रहे हैं। उम्मीद है कि वो अपनी राजनीतिक परिवक्वता आने वाले दिनों में साबित करेंगे। लेकिन पप्पू की छवि को धुलने में शायद कुछ समय और लगे। ऐसे में मौजूदा समय में मैं उन्हें पीएम पद का दावेदार के तौर पर नहीं देख रहा हूं। राहुल का देहरादून में स्वागत। किसी को बुरा लगे तो वे होली का ध्यान करें कि बुरा न मानो होली है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

साहू की शहादत से समझ जाना चाहिए कि कितना जोखिम लेते हैं हम पत्रकार

 

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