हकीकत या फसाना – मरीना डूब रही थी और डीएम छोले-भटूरे खा रही थी?

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photo source: social media
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जिला पंचायत, टाडा और यूटीडीसी के त्रिकोणीय पेच में फंसी मरीना की सुध न तो डीएम सोनिका सिंह ने ली और न ही गढ़वाल कमिश्नर ने। पर्यटन सचिव दिलीप जावलकर को सरकार से कहीं अधिक अपने परिवार की चिन्ता है। इसलिए उन्होंने भी कोई सुध नहीं ली। पता नहीं अफवाह है या सच कि जब मरीना डूब रही थी तो डीएम सोनिका सिंह निष्फ्रिक छोले-भटूरे खा रही थी। उन्होंने झील तक जाने की जेहमत नहीं उठाई और झील पर मौजूद एसडीएम साब सुपरमैन बनकर अपने हाथों से नाव को डूबने से बचाने के लिए खींच रहे थे।

खैर, मरीना के डूबने की वजह उसकी देख-भाल न होना है। दरअसल, झील में पानी का स्तर कम-ज्यादा होता है। ऐसे में नाव की एंकरिंग के लिए पानी में उतर कर एंकर डालना पड़ता है, लेकिन गजब हाल यह है कि जब कोई क्रू था ही नहीं तो फिर कौन एंकरिंग करता? पहले तो जिला पंचायत वाले कर देते थे। जब टाडा व यूटीडीसी के पास अधिकार गए तो पंचायत ने लोकल आपरेटर की मदद लेनी भी छोड़ दी। बस, फिर क्या था सर्दियों में झील का पानी कम हो जाता है तो मरीना पहाड़ पर लटक गई, इस बीच उसकी मोटर भी खराब हो गई। मरीना झील की बजाए पहाड़ पर चार माह तक लटकी रही, लेकिन किसी ने उसकी सुध नहीं ली। जीएमवीएन के कुक व वेटर ने इस संबंध में प्रशासन को चेताया भी लेकिन नक्कारखाने में किसकी तूती बोलती है। जब गरमी आई तो झील में पानी बढ़ा, नाव के चैंबर में पानी घुस गया और मरीना डूब गई। सरकार अब मरीना को पानी से बाहर निकालने में जुटी हुई है।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

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