काश, हर डाक्टर नवीन बलूनी जैसा होता!

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  • यह कहानी नहीं, सच्चाई है

देहरादून के चंदन नगर का एक आठ बाई आठ के कमरे में एक मां अपनी बेटी नाज को डाक्टर बनने के सपने बुनती है। मां आंगनबाडी वर्कर है। डाक्टर बनने के लिए मेहनत और योग्यता के साथ बहुत से आर्थिक संसाधनों की जरूरत होती है। ऐसे में महिला समाख्या की गीता गैरोला इस बच्ची को लेकर बलूनी क्लासेस में पहुंचती है। डा. नवीन बलूनी और उनके भाई विपिन बलूनी रोजा नाज अंसारी को सुपर 50 में चयन न होने के बावजूद नि:शुल्क कोचिंग देते हैं। और एमबीबीएस में चयन होने के बाद एक लाख रुपये की मदद भी देते हैं। नाज आज एमबीबीएस थर्ड ईयर में है।

इसी तरह से उत्तरकाशी का एक युवा हरिद्वार के होटलों में बर्तन मांजने व रूम ब्यॉय का काम कर रहा था, उसने भी डाक्टर बनने का सपना देखा और डा. बलूनी ने उसकी प्रतिभा देख मुफ्त कोचिंग दी। आज वह भी दून मेडिकल कालेज में अध्ययनरत है। ऐसे मेधावी बच्चों की कई कहानियां हैं, जिनके सपने को डा. नवीन बलूनी ने साकार करने का काम किया। लेकिन उन्होंने कभी सार्वजनिक जीवन में अपनी उपलब्धियों का गुणगान नहीं किया। आज भी वो सीएम के सलाहकार हैं लेकिन नाम से कहीं अधिक काम में विश्वास रखते हैं। बलूनी क्लासेस उनके सपनों की ऐसी दुनिया है जिसमें प्रवेश करने वाले हर मेधावी बच्चे की राह आसान हो जाती हैं और जीवन स्वर्णिम। सुपर-50 योजना के तहत डा. नवीन बलूनी ने अब तक देश व प्रदेश को 250 से भी अधिक डाक्टर व इंजीनियर दिए हैं। ऐसे दूरदर्शी व परोपकारी सोच, सामाजिक दायित्व की भावना लिए और विनम्र डा. नवीन बलूनी को उनके जन्मदिन की शुभकामनाएं।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

हैल्लो एसपी ट्रैफिक एंड सीपीयू कहां हो भाई?

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