तो आओ अब लौट चलें दूरदर्शन के पास

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  • न्यूज चैनलों के रणबांकुरों से परेशान
  • सबसे शांत और विश्वसनीय है डीडी न्यूज

पिछले एक पखवाड़े से न्यूज चैनलों को देखा। हर चैनल पर एक टैग लगा है। महिला एंकर जो स्कूटी चलाना भी नहीं जानती हैं और थोड़ा सा बुखार आने पर छुट्टी ले लेती हैं, वो इतनी वाचाल कि मुंह से ही तोपे-गोले उगल कर पाकिस्तान को नेस्तानाबूद कर रही हैं। और पुरुष एंकरों का कहना ही क्या, उनकी जुबान देशभक्ति से कहीं अधिक आने वाली सात तारीख की सेलरी की उम्मीद में ब्रह्मोस और अग्नि मिसाइलें पाकिस्तान की ओर छोड़ते जा रहे हैं। ऐसे में युद्ध की चाहत या आतंकवाद से त्रस्त जनता चाहती है कि शांति और सद्भाव की बात हो, देश सुरक्षा की बात हो। सार्थक बहस हो न कि कौओं की तरह कांव-कांव।

यदि आपको सार्थक बहस चाहिए, तथ्य और विश्वसनीयता चाहिए तो वह सिर्फ दूरदर्शन के पास है। क्योंकि दूरदर्शन ही ऐसा चैनल है जो सरकार के पक्ष में होते हुए भी संतुलित बात कहता है और दिखाता है। डीडी न्यूज ने अपनी विश्वनीयता को बचाए रखा है। लोग भले ही डीडी न्यूज को कुछ भी कहें लेकिन न्यूज चैनलों की इस भीड़ में यदि सुकून चाहिए, सकारात्मकता चाहिए, रचनात्मकता चाहिए और अपनी सांस्कृतिक, सामाजिक विरासत का संरक्षण चाहिए तो डीडी न्यूज देखिए। मेरा दावा है कि आपको कहीं न कहीं राहत मिलेगी, खबरों के साथ सकून मिलेगा। मैं ये इसलिए नहीं कह रहा हूं कि मैं डीडी न्यूज से जुड़ा हूं। मैं इसलिए कह रहा हूं कि मैंने और आपने इस दौरान यह एहसास किया है कि निजी न्यूज चैनल साबुन की टिकिया की तर्ज पर खबरों को बेचते हैं।

[वरिष्‍ठ पत्रकार गुणानंद जखमोला की फेसबुक वॉल से]

युद्ध नहीं, सवालों के जवाब चाहिए?

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