आजमगढ में अखिलेश को कैसे हराएंगे पीएम मोदी, टीपू के पक्ष में हैं सारे समीकरण

0
15
Akhilesh Yadav, ANI Photo.

 

 आजमगढ : प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए पूर्वी उत्तरप्रदेश की आजमगढ संसदीय सीट खासा अहम है. इसकी वजह है यहां से समाजवादी पार्टी के सुप्रीमो अखिलेश यादव का मैदान में होना. अखिलेश यहां पिता की विरासत संभालने आए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गुरुवार को आजमगढ में चुनाव प्रचार करने गए थे. उन्होंने इस दौरान भोजपुरी स्टार तिकड़ी मनोज तिवारी, रवि किशन और दिनेश लाल निरहुआ की तारीफ की और भोजपुरी भाषा एवं संस्कृति के बारे में काफी कुछ कहा. ये तीनों भाजपा के टिकट पर लोकसभा मैदान में हैं और इन्हीं में से एक निरहुआ आजमगढ लोकसभा सीट से मैदान में हैं.

निरहुआ अखिलेश की तरह ही यादव हैं पर सपा प्रमुख की तरह बाहरी नहीं. उत्तरप्रदेश जैसे बड़े राज्य में अखिलेश पश्चिमी उत्तरप्रदेश से पूर्वी उत्तरप्रदेश चुनाव लड़ने आए हैं, जबकि निरहुआ बगल के गाजीपुर के हैं. हालांकि बड़े राज्यों में बाहरी-भीतरी का दावं उतना अहम नहीं होता. ऐसे में निरहुआ के लिए राष्ट्रवाद, नरेंद्र मोदी की छवि, अमित शाह का चुनाव मैनेजमेंट, योगी आदित्यनाथ की धमक व काम और खुद का स्टारडम ही कारगर हथियार हैं.

वही,ं दूसरी ओर अखिलेश यादव का बड़ा राजनीतिक कद, यादवों का उनकी पार्टी से स्वाभाविक झुकाव, मुख्यमंत्री के रूप में इस इलाके में उनके द्वारा किए गए कामकाज अहम हैं.

आजमगढ में 17 लाख 70 हजार से अधिक मतदाता हैं. आजमगढ में सबसे बड़ा मतदाता वर्ग दलित समुदाय का है. दलितों की आबादी यहां 31 प्रतिशत है, दूसरे नंबर पर यादव 17 प्रतिशत हैं, जबकि तीसरे नंबर नंबर पर मुसलिम 12 प्रतिशत हैं. इसके अलावा छह प्रतिशत ब्राह्मण वोटर हैं.

यानी जातीय समीकरण के हिसाब से देखें तो पूरा खेल महागठबंधन के पक्ष में नजर आता है, क्योंकि मायावती दलित एवं मुसलिम वोट बैंक पर जबकि समाजवादी पार्टी यादव एवं मुसलिम वोटों पर अपनी पकड़ होने का दावा करती रही हैं.

इन तीनों वर्ग की संयुक्त आबादी 60 प्रतिशत है, जो कुल वोट बैंक के आधे से बहुत अधिक है. ऐसे में जातीय समीकरण अखिलेश के पक्ष में है. लेकिन, यह जातीय समीकरण 100 प्रतिशत काम करेगा ही ऐसा नहीं कहा जा सकता है.

निरहुआ भी यादव हैं और अगर वे यादव वोट बैंक को तोड़ लेते हैं, दलित जातीयों की सोशल इंजीनियरिंग का लाभ भाजपा पिछले लोकसभा चुनाव की तरह उठा सकती है तो पूरी बाजी पलट भी सकती है. हालांकि यह मौजूदा परिस्थिति में बेहद मुश्किल काम है.

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here