मोदी विरोध में अकेले पड़ते राहुल और गठबंधन की खुलती गांठें, अब क्या ?

0
26
कॉन्सेप्ट इमेज।

अब यह लगभग साफ हो चुका है कि यूपी-बिहार, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश, जम्मू-कश्मीर और ओड़िसा में मोदी को किसी एकजुट गठबंधन का सामना नहीं करना पड़ेगा। जिन राज्यों में वह अभी हाल में हारी है, वहां भी उसे कांग्रेस का ही मुकाबला करना होगा। बिहार-यूपी में भाजपा को जबरदस्त राहत मिली है, जहां उसे मुलायम और लालू का सीधा-सीधा मुकाबला करने से राहत मिल गई है।

चांदनी बार : ‘बार गर्ल’ के जीवन पर बनी मर्मस्पर्शी फिल्म

थोड़ा पीछे जाएं, जब यूपी में भाजपा ने जबरदस्त जीत हासिल की थी तब मोदी के खिलाफ आंध्रप्रदेश से एक महागठबंधन की आवाज उठी थी। उस समय चंद्रबाबू नायडु सबसे सक्रिय हुए और सभी स्थानीय क्षत्रपों को एकजुट किया। राहुल गांधी को सबसे जोड़ा, लेकिन मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान के चुनाव परिणामों ने मोदी के फौरी तौर पर राहत दे दी है। जीत के साथ ही राहुल और आम कांग्रेसी जोशीला हो गया और वह बेहद आक्रामक तरीके से यूपी-बिहार में ताल ठोंकने लगा। बस, इसी के बाद से वे सभी दल सतर्क हो गये, जो कांग्रेस की कब्र पर पनपे थे। इन राज्यों में कांग्रेस का मृत पड़ा संगठन ताल ठोकने लगा। एकदम से राहुल का कद बढ़ गया था।

भूपेश बघेल : ऐसा नेता जिसने जोगी के सामने कभी हथियार नहीं डाला

दीनहीन कांग्रेस से समझौता करने में सपा, बसपा, राजद, टीएमसी और टीडीपी को आसानी होती, लेकिन ताकतवर होती कांग्रेस से समझौता करना इनके लिये आत्मघाती होगा। ये सभी दल कांग्रेस के वोट बैंक पर ही टिके हैं या सत्ता में रहे थे। ममता-कांग्रेस में यदि समझौता होता है तो फिर टीएमसी का कोर वोटर और कांग्रेस के कोर वोटर में क्या अंतर होता। यही हाल सपा, बसपा का है। यहां बीजू जनता दल की बात थोड़ी अलग है। वहां अभी भी कांग्रेस का संगठन मौजूद है। पर, जानकी बल्लभ पटनायक के बाद कोई कांग्रेसी नेता ऐसा नहीं है, जिसे राष्ट्रीय स्तर पर जाना जा गया हो।

कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर क्यों सहज नहीं है कोई दल ?

यही हाल उसका आंध्रप्रदेश-तेलंगाना में है। टीआरएस और टीडीपी का जन्म ही कांग्रेस विरोध की पृष्ठभूमि पर हुआ है। जगनमोहन रेड्डी के तौर पर अभी भी उनके पिता की यादें लोगों से जुड़ी हुई हैं, जिनके निधन के शोक में 122 लोगों ने सुसाइड कर लिया था। वाइ.एस राजशेखर रेड्डी दक्षिण भारत में कांग्रेस के अंतिम ऐसे नेता रहे, जिन्होंने अपने दम पर चंद्रबाबू नायडु और के चंद्रशेखऱ राव को समेट दिया था।

स्वाइन फ्लू से आप कैसे बचें, जिससे पीड़ित हो गये हैं अमित शाह

दरअसल, इन दलों के भीतर जो कांग्रेस को लेकर अंतर्विरोध की धारा है, उसने मोदी के खिलाफ किसी भी तरह के गठबंधन के आसार को ही मिटा दिया है। जो पुराने कांग्रेसी हैं, वे इस बात को खूब समझते हैं। तभी अहमद पटेल, मोतीलाल बोरा, दिग्विजय सिंह, अशोक गहलोत, कमलनाथ और गुलाम नबी आजाद सरीखे नेताओं ने ज्यादा उत्साह नहीं दिखाया। ये उस वक्त भी चुप रहे, जब राहुल गांधी महागठबंधन के नेताओँ के साथ फोटो-सेशन करा रहे थे। हालांकि, 10 दिसंबर को जब रालोसपा के उपेंद्र कुशवाहा महागठबंधन की बैठक में शामिल होने गए तो वहां माया-अखिलेश के साथ-साथ कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता भी कहीं नहीं दिखे।

अभी जो हालात बन रहे हैं, उसके मुताबिक तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत ने उसके लोकसभा चुनाव के परिदृश्य को लगभग धुंधला कर दिया है। ज्योंहि कांग्रेस का विरोध दूसरे दलों के लिए अंतर्विरोध में बदलता, तबतक चालाक मोदी-शाह की टीम ने कांग्रेस की राफेल पर तेज हो रही धार को कुंद कर दिया। क्योंकि, यह कांग्रेस का कोर इश्यू था, जिसे लेकर वह लोकसभा चुनाव में मोदी की टीम पर हमला करने की योजना बना चुकी थी। इस पर सही वक्त देखकर निर्मला सीतारमण के पलटवार ने राहुल के सवालों की संख्या एकदम से छोटी कर दी।

कमलनाथ सरकार में बगावत की तैयारी में सपा और बसपा के विधायक, होटल में की बैठक

क्योंकि, पिछले दो साल से राहुल ने राफेल का मुद्दा उठा रखा था। करप्सन के कोर इश्यू की ही हवा निकल चुकी थी। ऐसे में शातिर मायावती और अखिलेश को साथ मिला लालू प्रसाद का। बस, राहुल या कांग्रेस के नेतृत्व में बन रहे महागठबंधन की एक-एक परतें और गांठें खुलनी शुरू हो गई है। दूसरी ओर, एससी-एसटी एक्ट पर फिर से अध्यादेश लाना, सवर्णों को आरक्षण देने के साथ ही राज्यों में मित्र दलों को पैकेज की मोटी रकम देकर मोदी ने यह पक्का कर लिया है कि जब वे चुनाव में जाएं तो उनके पास सवर्ण, दलित और ओबीसी में शामिल जातियों का अधिकांश उनके फेवर में आ जाए।

‘मोकामा में विकास बा…अनंते अनंत बा…ठीक है’ : ‘छोटे सरकार’ अब बड़े बनने की तैयारी में ?

अंतरिम बजट में यदि मोदी ने किसानों के संबंध में भी किसी भारी-भरकम योजना का एलान कर दिया तो तय मानिए कि कांग्रेस अकेली पड़ सकती है, क्योंकि गठबंधन के सभी दलों को अपनी-अपनी वोटों की चिंता खाये जा रही है। दूसरी ओर, तीन राज्यों में पराजय के बाद मोदी इस बात को समझ चुके हैं कि हाल के दिनों में कांग्रेस या राहुल के प्रति बेवजह की आक्रामकता को लोग नापसंद कर रहे हैं। साथ ही मोदी विरोध की हवा इन तीन राज्यों के चुनाव परिणामों के रूप में एक सेफ्टी वॉल्व को फोड़ कर निकल चुकी है। एक और फायदा भाजपा को मिला कि इन राज्यों में एकबार फिर से कांग्रेसियों ने अपनी झगड़ालू प्रवृत्तियों की झलक दिखा दी है। क्योंकि, यह बात दीगर है कि केवल छत्तीसगढ़ को छोड़ कर मध्यप्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस जीती नहीं है।

यह संभव था कि यदि इन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें नहीं बनती तो लोकसभा चुनाव के लिये मोदी को अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती और नुकसान ज्यादा होता। तब कमजोर कांग्रेस के पीछे सभी ताकतवर क्षेत्रीय दल एकजुट हो जाते। क्योंकि, तब वे इन क्षेत्रीय क्षत्रपों में से किसी को पीएम बनाते और कांग्रेस के कंधे पर सवारी भी करते। यदि यह अनुमान लगाया जाए कि तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकारों ने उसे लोकसभा चुनाव में बैकफुट पर धकेल दिया है और गठबंधन की राह मुश्किल कर दी है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।

(बिहार डेस्क प्रस्तुति)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here