इस चुनाव बाद ‘राजनाथ की राजनीति’ किस करवट बैठेगी?

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नामांकन करने जाते राजनाथ सिंह, भीड़ बहुत जुटी लेकिन पार्टी का कोई बड़ा चेहरा साथ नजर नहीं आया.

 

लखनऊ : भारतीय जनता पार्टी के कद्दावर नेता राजनाथ सिंह ने आज उत्तरप्रदेश की लखनऊ सीट से अपना पर्चा दाखिल कर दिया. राजनाथ सिंह ने नामांकन में वैसी भव्यता नहीं थी जैसी भव्यता पिछले दिनों गांधीनगर से भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के नामांकन के दौरान दिखी या फिर जैसी भव्यता 26 अप्रैल को काशी में वाराणसी लोकसभा से प्रधानमंत्री अमित शाह के नामांकन के दौरान दिखेगी. हालांकि प्रधानमंत्री व पार्टी अध्यक्ष का पद विशिष्ट होता है, फिर भी पार्टी के मौजूदा नेताओं में सबसे लंबी अध्यक्षीय पारी खेलने वाले शख्स व सरकार में नंबर दो की हैसियत रखने वाले शख्स के नामांकन को लेकर उम्मीदें कुछ अधिक होती हैं.

राजनाथ सिंह के नामांकन में उत्तरप्रदेश के दोनों उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य व दिनेश चंद्र शर्मा, कलराज मिश्र सहित कुछ अन्य नेता शामिल हुए. राजनाथ सिंह ने अपना नामांकन भरने से पहले स्वर्गीय अटल बिहारी वाजपेयी को ट्विटर पर याद किया और इस शहर को वल्र्ड क्लास सिटी बनाने का संकल्प दोहराया. राजनाथ सिंह से पहले वाजपेयी ही इस संसदीय सीट का प्रतिनिधित्व करते थे. 2014 में गाजियाबाद को छोड़ कर राजनाथ यहां अटल जी की विरासत के वास्तविक उत्तराधिकारी होने का भाव लिये चुनाव लड़ने आये.

अमित शाह ने जब पिछले दिनों लोकसभा चुनाव के लिए पहली बार गांधीनगर से नामांकन भरा था तब उसमें राजनाथ सिंह, अरुण जेटली व नितिन गडकरी व साथ शिवसेना चीफ उद्धव ठाकरे पहुंचे थे. राजनाथ शाह के रोड शो में भी शामिल हुए थे. अमित शाह के रोड शो व नामांकन की भव्यता में यह चीज बहुत ठोस ढंग से दिखी कि संगठन हो या सत्ता पीएम मोदी के बाद वे सबसे प्रभावी नेता की हैसियत में पहुंच चुके हैं. उनके नामांकन के स्वरूप में मोदी के भावी उत्तराधिकार का संकेत भी नजर आया.

2014 का लोकसभा चुनाव राजनाथ की अध्यक्षता में लड़ा गया था, जिसमें घोषित तौर पर नरेंद्र मोदी पीएम उम्मीदवार थे. 2019 का चुनाव अमित शाह के विस्तारित अध्यक्षीय कार्यकाल में लड़ा जा रहा है और मोदी तो प्रधानमंत्री है हीं. राजनाथ मोदी सरकार में नंबर दो की हैसियत में हैं.

2019 के लोकसभा चुनाव का परिणाम का संख्या गणित राजनाथ सिंह के राजनीतिक प्रासंगिकता के विस्तार व सिकुड़न के लिए निर्णायक होगा. निश्चित रूप से अगर मोदी-शाह की जोड़ी 2014 से उम्दा या उसके लगभग करीब प्रदर्शन भी करती है तो यह राजनाथ की राजनीति की सीमाएं तय करने वाला होगा. अगर भाजपा अपने बूते बहुमत से खासा दूर रहती है और सहयोगी दलों पर सरकार संचालन के लिए उसकी निर्भरता बढती है तो इससे राजनाथ सिंह की राजनीति को विस्तार मिलेगा. इसकी वजह राजनाथ की पार्टी के दायरे से बाहर स्वीकार्यता है.

राजनाथ सिंह के हर पार्टी और हर अहम नेता से अच्छे रिश्ते हैं. राजनीति के राजनीति में प्रतिस्पर्धा का भाव रहा है, कटुता का नहीं. जबकि पिछले दो-तीन दशकों में राजनीति में कटुता एक अहम तत्व बन गया है. राजनीतिक मोर्चे पर कई ऐसी चुनौतियां हैं जिससे राजनाथ अधिक कुशल ढंग से निबट सकते हैं.

भाजपा की अंदरूनी राजनीति में राजनाथ सिंह एक बफर पर्सन भी हैं, जो संघ परिवार के लिए भी संतुलन बनाये रखने के लिए आवश्यक हैं. हालांकि यह तय है कि 67-68 साल के चुके मोदी, राजनाथ, जेटली, सुषमा की प्रभावी राजनीति इस चुनाव के बाद अगले एक और चुनाव तक ही रहे और उसके बाद पूरी तरत से नया नेतृत्व तैयार हो जाये. उस समय भी तब इनके लिए 75 प्लस का फार्मूला लागू होगा. ऐसे में नितिन गडकरी, अमित शाह, योगी आदित्यनाथ, शिवराज सिंह चैहान व अन्य कोई छिपे रूस्तम बड़े खिलाड़ी के रूप में उभर सकते हैं.

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