नरेंद्र मोदी को लेकर बुद्धिजीवियों की भविष्यवाणी गलत क्यों साबित होती है ?

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Narendra Modi File Photo.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इंटरव्यू को लेकर सोशल मीडिया में बवाल है. इस इंटरव्यू को मोदी का फेयरवेल बताया जा रहा है. देश में पहली बार किसी नेता के साथ ऐसा हुआ होगा जिसके इंटरव्यू देने से इतनी आलोचना का शिकार होना पड़ा है. पिछले चार साल से नरेंद्र मोदी की हर गतिविधी पर कड़ी निगरानी रखने वाले देश के बुद्धिजीवी वर्ग की भविष्यवाणी हर वक्त गलत साबित होती आयी है. मीडिया जितना गांधी परिवार के सदस्यों के लिए सहृदय रहती है, नरेंद्र मोदी की आलोचना में उतना ही क्रूरता दिखाती है. ऐसी परिस्थिति में जनता का सहानूभूति नरेंद्र मोदी के साथ हो जाता है. अगर आलोचना बराबर की होती तो देश के कथित बुद्धिजीवी वर्ग के प्रति सहानूभूति बची रहती.

आम भारतीयों में अब भी नरेंद्र मोदी की साख को लेकर सवाल नहीं है. ऐसा इसलिए भी है क्योंकि भारत लंबे समय तक वंशवाद और भ्रष्टाचार से पीड़ित रहा है. भारत के नेताओं के साथ सबसे बड़ा सवाल साख का है. एकतरफ वह सिद्धांतों की बात करते हैं. दूसरी और वह चुनावों में अपने संतानों को बढ़ाते हैं. ऐसे में परस्पर विरोधाभासी विचारों की वजह से जनता के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है. अगर विचार सही भी हो तो वह उनके कर्म से नहीं मिलते हैं. वहीं जब कथित बुद्धिजीवी वर्ग जब ऐसे नेताओं के साथ खड़े होकर समर्थन करते हैं तो उनके विश्वसनीयता पर भी सवाल उठने लगता है.

कल के दिये इंटरव्यू में सोशल मीडिया में कईयों ने उनकी आलोचना की. कई लोग तो मन की बात का वीडियो वर्जन बताने से नहीं चूके. जनता के साथ संवाद में माहिर प्रधानमंत्री अगर इंटरव्यू दे भी तो भी वह आलोचना की कसौटी में कसे जाते हैं. तीन तलाक की प्रकरण को ही उदाहरण के लिए लेते हैं. इस प्रथा में हलाला जैसी खराब रिवाज है. जिसके बारे में सारा देश जानता है. फिर भी कांग्रेस सहित कम्यूनिस्ट पार्टी इसके खिलाफ नजर नहीं आती है. यह एक किस्म का छिपा हुआ एजेंडा है या फिर वोट खोने का डर.

लोकसभा चुनाव और देश की राजनीति
आने वाले दिनों में किसी भी पार्टी के लिए भारत में राजनीति करना आसान नहीं होगा. देश ने आजादी के बाद सत्तर साल की दूरी तय कर ली है. इस दौरान जनता सभी के विचार, कार्यशैली और उनके पीछे के विरोधाभास को समझ चुकी है. आज की युवा पीढ़ी विचारधारा से मुक्त है. वामपंथ न तो उसका पेट भर सकता है और न ही दक्षिणापंथ उसे खुला जीवन दे सकता है.

वह किसी भी दल या नेता को काम की कसौटी पर कसती है. वह विचारों का बोझ ढोने की तैयार नहीं है. भारत अब सौ साल पहले कठोर जाति व्यवस्था वाला समाज भी नहीं रहा है. जाति व्यवस्था अब भी भारत के ज्यादातर हिस्सों में शादी और रिश्तों तक ही सीमित है. यह न तो प्रोफेशन और भेदभाव का आधार बन रहा है. जिस दलित समाज की बात की जाती है. वह अब पहले की तुलना में ज्यादा पूजा – अर्चना करता है.

केजरीवाल का उदय
अरविंद केजरीवाल की राजनीति दिल्ली तक ही सीमित है लेकिन फिर भी जनता का विश्वास है. लोगों की नजर में अरविंद केजरीवाल अब भी भ्रष्ट नहीं है और उनकी पार्टी को उम्मीद भरी निगाहों से देखा जा रहा  है. इसलिए लोग उन्हें कांग्रेस का विकल्प होने का मौका देंगे. कांग्रेस का विकल्प के रूप में आप फैल सकती है.

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