इंटरव्यू के बहाने देश में बजा चुनावी बिगुल

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लोकसभा चुनावों में ज्यादा वक्त नहीं है लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एएनआई को एक जनवरी के दिन इंटरव्यू देकर चुनावी बिगुल बजा दिया है. उधर पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने विभिन्न प्रदेशों में चुनाव प्रभारी नियुक्त कर बता दिया कि वह तैयारी में लग चुके हैं. कांग्रेस भी चुनावी तैयारी में जुटी है. तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस लोकसभा चुनाव मैदान में उतरेगी तो पहले की तरह उसके कार्यकर्ता पस्त हौसले नहीं बल्कि लड़ाई के मूड में होंगे.

कांग्रेस और भाजपा की अपनी – अपनी चुनौतियां हैं. भाजपा पांच साल शासन करने के बाद चुनाव लड़ रही है. फिर भी नरेंद्र मोदी से जनता में उब नहीं है. उनके पांच साल के कामकाज को लेकर आक्रोश है कि वह अपने कुछ वादों पर खरा नहीं उतर पाये लेकिन आक्रोश इस हद तक नहीं है कि वे दूसरे नेता को मोदी का विकल्प के रूप में देखने लगे.

कांग्रेस पार्टी ने जिन तीन राज्यों में चुनाव जीता है. वहां राहुल गांधी के नेतृत्व के साथ – साथ अहमद पटेल के प्रबंधन का भी असर है. वहीं कांग्रेस के शीर्ष नेताओं के अस्तित्व का सवाल था. उनकी करियर दांव में लगी हुई थी. इसलिए प्रचार के दौरान मध्यप्रदेश में कमलनाथ और सिंधिया ने सारे मतभेद भुला दिये तो राजस्थान में सचिन गहलोत के बीच मनमुटाव नहीं रहा है. लेकिन लोकसभा चुनाव में यह मतभेद वापस फिर से दिखाई पड़ सकती है.

कांग्रेस की जीत के साथ तीसरे मोर्चे की उम्मीद बढ़ी
कांग्रेस अगर कमजोर रहती तो महागठबंधन के मजबूत होने की संभावना बढ़ जाती. लेकिन अब तीसरे मोर्चे की खेमे में मजबूती दिख रही है. ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा रखते हैं. इसलिए वह कांग्रेस की समर्थन देने की मूड में नहीं दिखते हैं.

एक तरफ इस जीत ने जहां कांग्रेस का मनोबल बढ़ाया. वहीं दूसरी और पार्टी में गुटबाजी भी तेज कर दिया. ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट कहीं – न – कहीं खुद को मुख्यमंत्री का दावेदार मानते है. आने वाले दिनों में उनका असंतोष बढ़ सकता है.

भाजपा के अंदर भी मोदी को लेकर पार्टी के अंदर असंतोष महसूस किया जा रहा है. खुलकर यह सामने नहीं आ रहा है लेकिन अमित शाह और नरेंद्र मोदी के कार्यशैली से पार्टी के अन्य नेताओं में आक्रोश है. पार्टी के अंदर नेताओं में भाजपा के पुराने दिनों की यादाश्त है. जहां अटल – आडवाणी का नेतृत्व सबको विश्वास में लेकर फैसला लेते थे.

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