गौतमबुद्धनगर की ग्राउंड रिपोर्ट : महेश शर्मा के लिए साइकिल पर सवार हाथी ने खड़ी कर दी है पहाड़-सी चुनौती

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ऑप्शन बी न्यूज की चुनाव यात्रा पर कुणाल किशोर

राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सटा गौतमबुद्धनगर संसदीय क्षेत्र एक हाइप्रोफाइल निर्वाचन क्षेत्र है. यहां मशहूर डाॅक्टर एवं केंद्रीय मंत्री महेश शर्मा चुनाव उम्मीदवार हैं. डाॅक्टर शर्मा को कमल खिलाने में इस बार साइकिल पर सवार हाथी से जोरदार टक्कर मिल रही है. उधर, राहुल गांधी का पंजा भी भाजपा के कमल को उखाड़ फेंकने को तैयार नजर आ रहा है. यूपी के महागठबंधन की ओर से यहां से मायावती की बसपा के प्रत्याशी सतबीर नागर मैदान में हैं. जबकि कांग्रेस से यहां डाॅ अरविंद सिंह चुनाव मैदान में हैं. यादव, गुर्जर, मुसलिम व ठाकुर बहुल इस संसदीय क्षेत्र में महेश शर्मा के उलट ये दोनों उम्मीदवार इलाके के बड़े जातीय समुदाय का प्रतिनिधित्व करते हैं और यह बात उनके पक्ष में जाती है. जबकि महेश शर्मा के पक्ष में पीएम मोदी का प्रतिनिधि होना ही सबसे अहम बात है.

गौतमबुद्धनगर, जिसे लोग नोएडा के नाम से जानते हैं, एक ऐसा निर्वाचन क्षेत्र है, जहां गांव के अवशेष पर अट्टालिकाएं बनी हुई हैं. एक ही जगह विशाल बिल्डिंग और कच्चे मकान एक विरोधाभाष की स्थिति बनाते हैं. तेज शहरीकरण व एनसीआर का हिस्सा होने के कारण गांवों का अस्तित्व खत्म हो रहा है और वे शहर बन रहे हैं, प्रधानी खत्म हो रही है और ये कहने को गांव हैं, लेकिन कहलाते सेक्टर हैं. इस संसदीय क्षेत्र में 40 प्रतिशत ग्रामीण आबादी व 60 प्रतिशत शहरी आबादी है. यहां पहले चरण में 11 अप्रैल को वोटिंग है.

ग्रामीण सुरिंदर अपनी पीड़ा बताते हुए.

इस संसदीय क्षेत्र में शिक्षा, नौकरी के लिए प्रवासियों की भरमार है, जिसमें बिहार, झारखंड व पूर्वी उत्तरप्रदेश सहित यूपी के अन्य हिस्सों के लोगों की बहुलता है. इनमें से बहुत सारे ऐसे लोग को छोटी नौकरियों व रोजगार में हैं, उन्होंने अपना वोटर के रूप में रजिस्ट्रेशन नहीं कराया है. ऐसे में वे न यहां वोट डालते हैं और न वोट जाने यूपी, बिहार या देश के अन्य हिस्सों में जा पाते हैं.

हम अपनी चुनावी यात्रा के क्रम में गढी चैखंडी गांव पहुंचते हैं. वहां हमारी भेंट सोविंदर सिंह से होती है. वे खुलते ही स्थानीय सांसद के खिलाफ गुस्सा जाहिर करते हैं. सुविंदर हमें बताते हैं कि उनका यह गांव अब सेक्टर 68 व सेक्टर 121 के बीच साझा रूप से पड़ता है. वे कहते हैं कि महेशा शर्मा न तो हमारे सुख में आते हैं न दुख में. इलाके में आते ही नहीं. हम उनके पास जाते हैं तो सिर्फ आश्वासन मिलता है. वे कहते हैं कि हम उन्हें सिर्फ होर्डिंग-पोस्टर में ही देखते हैं.

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सुरिंदर की चिंता है कि गांव में रोजगार नहीं है. शहरीकरण ने खेती-बाडी छिन ली, जमीन अधिग्रहण का पांच प्रतिशत मुआवजा नहीं मिला. वे खीझते हुए कहते हैं कि हमे महेश शर्मा को वोट नहीं देना है, हम तो हाथी को वोट देंगे. वे कहते हैं कि यहां महागठबंधन और कांग्रेस में ही टक्कर है.

गांव के बुजुर्ग कहते हैं कि समस्या बहुत है, नर्क में हम रह रहे हैं, गढी गांव का विकास नहीं हुआ है. प्लाट का पांच प्रतिशत नहीं दिया है. प्रधानी खत्म हो गयी, सांसद विधायक सुनते नहीं. प्लाट पर बिल्डिंग खड़ी हो गयी. योगी साहब ने डंपिंग ग्राउंड कह कर तो बंद करवा दिया, लेकिन कागजों पर यहीं है. डंपिंग ग्राउड वह जगह कहलाती है जहां शहर के कचरे गिराये जाते हैं. कहते हैं कि स्थानीय विधायक व राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह ने इस बारे में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की थी, जिसके बाद मौखिक आदेश पर वह काम तो रुक गया है, लेकिन औपचारिक आदेश उसके लिए नहीं हुआ है. बुजुर्ग बताते हैं कि गांव में सात-आठ हजार की आबादी है और भैंस पाल के ही अब हम गुजारा करते हैं.

नोएडा में युवा प्रोफेशनल व स्टूडेंट बहुत हैं. उनमें से जब एक से हमारी मुलाकात होती है तो वे कहते हैं कि स्किल्ड डेवलपमेंट नहीं हुआ है, चीन का लेबर भी हाइ स्किल्ड है, इसलिए कंपनियां वहां जाती हैं. वे एडुकेशन सिस्टम पर काम होने की उम्मीद जताते हैं और कहते हैं कि डेवलपमेंट का असर ग्राउंड पर दिखे.

एक युवा कहते हैं कि मोदी जी के पास विजन है, उनके द्वारा दी गयी टैक्स छूट से हमें राहत मिली है. लेकिन, बात पांच लाख की नहीं है, हम तो नौकरीपेशा हैं, कई लोग साल के दस से पंद्रह लाख कमा रहे हैं लेकिन टैक्स नहीं देते. उनका कहना है कि अभी आठ प्रतिशत लोग टैक्स देते हैं और इसका दायरा बढाया जाये.

यूथ प्रोफेशनल नोटबंदी एवं जीएसटी जैसे मोदी के बड़े फैसलों से खुश हैं. एक कहते हैं कि आज हम फ्लैट खरीदने की नोटबंदी के चलते ही सोच पा रहे हैं, क्योंकि इस सेक्टर में ब्लैक में लेनदेन सबसे अधिक होता है. नोटबंदी से सफाई हुई है.

हम अपनी चुनाव यात्रा में गलगोटिया इंस्टीट्यूट पहुंचते हैं. मैकेनिकल इंजीनियरिंग के एक छात्र कहते हैं हमलोग ने नयी तकनीक सीखी, अभी कश्मीर में जो घटना हुई उसके बाद हमने बुलेटप्रूफ गाड़ी लांच कर दी. उनका इशारा पुलवामा आतकी हमले की ओर है. वे कहते हैं कि हम इतने स्ट्रांग हों कि दूसरे देश हमें परेशान नहीं कर सकें. वे यह भी मानते हैं कि तकनीक गांव की सूरत भी बदल सकती है.

चुनाव यात्रा के क्रम में हमारी लाॅ स्टूडेंट से भी भेंट होती है. वे कहते हैं कि उनका इंस्टीट्यूट उन्हें फिल्ड की भी ट्रेनिंग देता है. वे मानते हैं कि रोजगार की चुनौती है, लेकिन वे जिस फिल्ड में हैं उसमें रोजगार भी है, और रोजगार जेनेरेट करने के मौके भी.

एक यूथ से बात होती है तो वे पकौड़ा बेचने और मैं भी चैकीदार जैसे नारों से खुश नजर आते. वे मानते हैं कि यह वास्तविक मुद्दों से बहस को भटकाता है. वे कहते हैं कि एक चैकीदार उतना नहीं कमा नहीं सकेगा जितना एक बीटैक.

गौतमबुद्धनगर का क्या है चुनावी गणित?

गौतमबुद्धनगर लोकसभा सीट 2008 के परिसीमन के बाद अस्तित्व में आयी. पहली बार इस लोकसभा क्षेत्र के नाम पर 2009 में वोट हुआ. इस निर्वाचन क्षेत्र में 16 लाख से अधिक वोटर हैं. 2009 में हुए चुनाव में यहां से बसपा के सुरिंदर सिंह नागर चुनाव जीते थे. उस चुनवा में उन्हें 2, 45613 वोट मिले थे, जबकि महेश शर्मा को 2, 29709 वोट हासिल हुए थे.

फिर, 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां डाॅ महेश शर्मा ने मोदी लहर पर सवार होकर 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल कर लिया. उन्हें उस चुनाव में 5, 99702 वोट मिले, जबकि समाजवादी पार्टी के नरेंद्र भाटी 3, 19490 वोटों के साथ दूसरे नंबर पर रहे. यह जीत-हार का बड़ा फासला था. लेकिन, तब सपा-बसपा अलग-अलग मैदान में थे. इस बार उनके साझा उम्मीदवार मैदान में हैं.

बसपा के सतबीर नागर फिर चुनाव मैदान में हैं, जिन्हें अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी का भी समर्थन हासिल है. ऐसे में डाॅ महेश शर्मा के लिए मुश्किल स्थिति है.

2009 में ग्रामीण क्षेत्र में शहरी क्षेत्र की तुलना में दुगुना मतदान हुआ और बाज़ी बसपा ने मार ली , 2014 की मोदी लहर में मतदान प्रतिशत 60 के लगभग जा पंहुचा और शहरी क्षेत्रो में भी भरी मतदान हुआ . शहरी क्षेत्र में भरी मतदान का लाभ ले डॉ महेश शर्मा ने लगभग 6 लाख वोटों के साथ सबको पस्त कर दिया . कमोबेश इस बार लड़ाई ऐसी बन पड़ी है की जीत उसी के पाले में जाये गी जो ज्यादा से ज्यादा अपने वोटरों को बूथ पर ले जा पाएगा , मतलब साफ़ है साइकल पर सवार हाथी ने इस इलाके में जातीय समीकरणों को साध कर महेश शर्मा के सामने पहाड़ सी मुश्किल खड़ी कर दी है , इसका तोड़ डॉ महेश शर्मा के लिए 60 % शहरी आबादी है जिसे उन्हें अपनी जीत सुनिश्चित करने के लिए हर हाल में बूथ तक ले जाना होगा .

—- सहयोगी अखिलेश दीक्षित के साथ

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