बुमराह :18 इंच के बीच सिमटे ‘खास खेल’ को नहीं समझ पा रहे बैट्समैन, आप यूं समझिए

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भारत के तेज गेंदबाज जसप्रीत बुमराह।

आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि जसप्रीत बुमराह की गेंदों को बल्लेबाज समझ क्यों नहीं पाता है। कुछ इसी तरह की बात पाकिस्तान के वसीम अकरम, अब्दुल कादिर, श्रीलंका के मुथैया मुरलीधऱन और ऑस्ट्रेलिया के शेन वार्न के संबंध में भी कही जाती थी। ये सभी जब अपने चरम पर थे, तो बल्लेबाजों को विकेट के सामने डांस करा देते थे। ऐसा नहीं है कि कुछ और भी बॉलर थे, जिनकी कुछ खूबियां ऐसी थी कि उनकी गेंदों को समझना मुश्किल हो जाता था।

थोड़ा पहले जाएं तो वेस्टइंडीज के कर्टली एंब्रोस, कोर्टनी वाल्श, मैल्कम मार्शल, भारत के अनिल कुंबले, कपिल देव, न्यूजीलैंड के रिचर्ड हेडली, इंग्लैंड के इयान बॉथम और ऑस्ट्रेलिया के ही क्रेड मैक्डॉरमेट, ब्रूस रीड, डेनिल लिली और ज्योफ थॉमसन का नाम आता है। इन सभी के गेंदों को बल्लेबाज समझ नहीं पाता था और अपना विकेट दे देता था।

गेंदों को नहीं समझने की एक ही तकनीक होती है कि जब गेंदबाज बॉल को अपने हाथों से बल्लेबाज की ओर रिलीज करता है तो वह उसे कितनी देर से छोड़ता है और किस लिहाज से। बल्लेबाज की नजर उसके हाथों और अंगुलियों पर टिकी रहती है कि वह किस तरह की गेंद डालने जा रहा है। साथ ही उस समय विकेट का मिजाज कैसा है, यह सब मिला कर ही बल्लेबाज यह तय करता है कि यह गेंद कहां गिरेगी और किधर निकलेगी।

अपने परिवार के साथ बुमराह।

गेंदबाजों में यह क्षमता प्राकृतिक तौर पर होती या फिर वह उसे अपनी प्रैक्टिस से पैदा करता है। या कई बार दोनों ही बात होती है। इस कड़ी में अब चर्चा करते हैं जसप्रीत बुमराह की। मेलबर्न टेस्ट में जीत के बाद सभी उनकी तारीफ कर रहे हैं। हाल में वसीम अकरम के बाद वे पहले ऐसे गेंदबाज हैं इस प्रायद्वीप से, जो यार्कर की मजबूती से लैस हैं। वसीम का छोटा रनअप उनके लिए मददगार होता था, साथ ही उनकी हाइट भी। इसलिये उनकी यार्कर को समझना मुश्किल होता था और विकेट मिल जाता था। यह हुनर उनको लगातार प्रैक्टिस से हासिल हुई थी।

श्रीलंकाई स्पिनर मुथैया मुरलीधरन।

अब बात बुमराह की। जब से ये टेस्ट खेल रहे हैं, तो उनकी गेंदों को देख कर पता चलता है कि उनका एक्शन ही उनकी ताकत है। यह प्राकृतिक देन है। या यूं कहें कि बचपन की आदत है। बचपन से ही जब वे घर में होते थे तो बॉल से घर की दीवारों को विकेट समझ कर प्रैक्टिस करते थे। तेज आवाज होने पर उनकी मां ने इस पर पाबंदी लगा दी थी। उनको अनुमति तब मिली, जब बेहद कम आवाज के साथ बॉलिंग करने की बात हुई। परेशान बुमराह ने अपनी गेंदों को उस जगह डालना शुरू किया, जहां एक दीवार दूसरी से मिलती थी और वह फर्श से भी जुड़ती थी। इसके साथ ही जोर की आवाज आनी बंद हो गई और उनकी प्रैक्टिस घर के अंदर चलती रही।

इयान बॉथम।

पर, यह सुविधा एक असुविधा लेकर आई थी। उनको अपना एक्शन बदलना पड़ा था। कम जगह होने के कारण उन्होंने अपनी बाहों को कंधे के पास न रख कर दूर रखा और बॉल को अंतिम समय तक देख कर फेंकने लगे थे। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि दीवार और फर्श को आखिरी समय तक देखना जरूरी हो गया था। इसका फायदा उन्हें ग्राउंड पर मिला। अब वे जब गेंद फेंकते थे तो उनकी कलाई कंधे से दूर रहती थी। थोड़ी नीची भी, जिससे विकेट आखिरी वक्त तक दिखता था, ठीक दीवार की तरह। उसके बाद तेजी से कंधे से दूर होती कलाई और उसमें फंसी बॉल को देखना काफी मुश्किल होता था। ऐसे में बल्लेबाज यह अनुमान नहीं लगा पाता था कि कौन सी बॉल आ रही है।

पाकिस्तानी गेंदबाज वसीम अकरम।

ऐसा ही कुछ श्रीलंका के स्पिनर मुरलीधरन के साथ था। वे बचपन में पोलियो से ग्रस्त हाथ से गेंद फेंकते थे। उनकी अंगुलियां इससे अभी भी प्रभावित थीं, इससे वे आखिरी समय तक अपनी हथेलियों में गेंद को छुपा कर रखते थे और अंगुलियां आखिरी में गेंद को फाइनल टच देती थीं, जिससे वह जबरदस्त गुगली बन जाती थी। पर, इस मामले में शेन वार्न उनपर भारी पड़ते थे। उसका कारण था, उनकी बड़ी सी हथेली, जिसमें गेंद गुम -सी हो जाती थी। साथ ही हथेलियों में इतनी ताकत थी कि वह गेंद को मनमाफिक घुमा लेते थे। यहां भी वही फैक्टर काम करता था कि गेंद को आखिरी वक्त फेंकना और गति में परिवर्तन।

गुगली तो पाकिस्तानी गेंदबाज अब्दुल कादिर की भी चर्चित थी। अपने वक्त में उनका कोई सानी नहीं था। वे भी अपनी गेंदों को वार्न के अंदाज में ही फेंकते थे। पर, उनकी हथेलियों और अंगुलियों की ताकत के साथ आखिरी समय तक दोनों हाथों में गेंदों को पकड़ते-छोड़ते रहते थे। इससे बल्लेबाज आखिरी समय तक यह अंदाजा नहीं लगा पता था कि वे किस तरह की गेंद करेंगे, जिससे समझने में दिक्कत होती थी और विकेट मिल जाता था।

इसी तरह तेज या मीडियम पेसर के साथ भी होता है। एक बेहद चर्चित गेंदबाज थे इयान बॉथम। अपने आखिरी वक्त में उन्होंने अपनी रफ्तार को काफी कम कर लिया था। फिर भी, उनकी गेंदों को बल्लेबाज ठीक से नहीं खेल पाते थे। कारण था, आखिरी लमहे तक गेंद को अपनी हथेली में छुपाए रखना। यह मौलिक मंत्र है कि जो भी गेंदबाज, चाहे वह अपने प्राकृतिक कारण से या प्रैक्टिस के कारण, अपने अंतिम समय तक गेंद को रखता है और जितना लेट रिलीज करता है, उसे सफलता मिलती है।

फिलहाल, अपने गेंदबाजी एक्शन से चर्चा में आए जसप्रीत बुमराह इसका फायदा उठा रहे हैं और भारत को जीत दिला रहे हैं। एक बचपन की आदत ने उनको आज विश्व के सबसे घातक गेंदबाजों की श्रेणी में लाकर रख दिया है। क्योंकि, वे अपने कंधों से कलाई को बेहद कम घुमाते हैं, कोहनी और कलाई के बीच ही सारा खेल चलता रहता है और विकेट मिलते रहते हैं। उनकी इस खूबी को सबसे पहले कोच जान राइट ने पहचाना था और राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी में लिली-कपिल जैसे धुरंधरों ने संवारा था। भारतीय टीम के बॉलिंग कोच भरत अरुण कहते हैं- हमे उसके कंधों को मजबूत बनाने पर खास काम करना पड़ता है, क्योंकि सारा अतिरिक्त भार वहीं तो पड़ता है।

(स्पोर्ट्स डेस्क प्रस्तुति)

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