रविकिशन : जौनपुर से निकला युवक कैसे बन गया हिंदी और भोजपुरी फिल्मों का स्टार

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भोजपुरी फिल्मों के सबसे काबिल अभिनेता रविकिशन को गोरखपुर से भाजपा का टिकट मिला तो एक बार फिर से वह सुर्खियों में आ गये. बनारस के समीप जौनपुर के छोटे से गांव आने वाले रविकिशन मुंबई मायानगरी, भोजपुरी फिल्मो के सुपरस्टार और अब भाजपा के टिकट से गोरखपुर के चुनावी मैदान में है.

बेहद सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले रविकिशन के पिता पुजारी थे. रविकिशन बचपन में सीता की भूमिका निभाते थे. इस बात से नाराज उनके पिता ने उन्हें कई बार खेती करने और दूध बेचने की सलाह दी. इधर रविकिशन का एक्टिंग के प्रति प्रेम बढ़ता जा रहा था और उधर पिता की नाराजगी भी बढ़ रही थी. आखिरकार ऐसा मोड़ भी आया जब उनकी मां ने सलाह दी कि वह घर छोड़ दे. वरना पिता का गुस्सा कभी भी फूट सकता है.

रविकिशन मुंबई चले आये और फिर संघर्ष का दौर शुरू हुआ. लेकिन कामयाबी के लिए कड़ी मशक्कत करनी पड़ी.एक साल तक मुंबई में संघर्ष करने के बाद 1991 में मुझे फिल्म ‘पितांबर’ में काम करने का मौका मिला. 1994 में काजोल के साथ फिल्म’ उधार की जिंदगी’ और 1996 में शाहरुख खान के साथ फिल्म ‘आर्मी’ में काम किया.

2003 में सतीश कौशिक की फिल्म ‘तेरे नाम’ उन्हें काम मिला. इस फिल्म में उन्होंने भूमिका चावला के मंगेतर की भूमिका निभायी थी.यह विचित्र संयोग है कि उन्होंने अपने पहली ही फिल्म में पुजारी की भूमिका निभायी.

‘तेरे नाम’ सफल हुई तो एक भोजपुरी फिल्मों में भी काम मिलने लगे. फिल्म ‘सैंइया हमार’ में उन्होंने काम किया. यह फिल्म हिट हुई. इसके बाद कई फिल्में आयी जो सिल्वर जुबली तक चली. ‘पंडित जी बताई न बियाह कब होई’ भी आयी. इस फिल्म में नगमा उनके अपोजिट में थीं. धीरे – धीरे भोजपुरी फिल्मों में वह छाने लगे.

वापस फिर से रविकिशन हिंदी फिल्मों में आये. ‘लक’ में उन्होंने काम किया. रविकिशन श्याम बेनेगल, मणिरत्नम और चंद्रप्रकाश द्विवेदी जैसे निर्देशकों के साथ काम कर चुके हैं.

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