यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी : राफेल विवाद या मंत्री न बनने का दर्द

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यशंवत सिन्हा और अरुण शौरी अकसर मोदी सरकार के खिलाफ खड़े नजर आते हैं. राफेल विवाद में एक बार फैसला आने के बावजूद इन दो पूर्व केंद्रीय मंत्रियों ने फिर से सुप्रीम कोर्ट का रूख किया है. केंद्र सरकार को लगातार घेरकर क्या वह फिर राजनीतिक रूप से पुनर्जीवीत होने की कोशिश में कामयाब हो पायेंगे की नहीं यह देखने वाली बात होगी. राजनीति के हर दौर में खास विचार और नेता ही प्रभावी हो सकता है.

राजनीति हो या फिल्म – यहां वक्त सबसे ज्यादा मायने रखती है. हर किसी के जीवन में एक स्वर्णिम वक्त आता है, जहां वह अपनी राजनीतिक करियर के सबसे ऊंचाई को छूता है. फिर उसे कुर्सी का मोह स्वत: छोड़ना पड़ता है या वक्त हाशिये में धकेल देती है. यशवंत सिन्हा ने देश के वित्त और विदेश मंत्रालय जैसे दो ताकतवर मंत्रालय का जिम्मा संभाला. जब भाजपा की सत्ता गयी तो वह झारखंड के मुख्यमंत्री बनने का अवसर तलाशने लगे. बेटे को सांसद का टिकट दिलवाने के बाद यशवंत सिन्हा की सक्रियता खत्म नहीं हुई.

पांच अप्रैल 2017 की घटना है. अपने संसदीय क्षेत्र बड़कागांव के महुदी में विवादित मार्ग से रामनवमी जुलूस निकालने के प्रयास में मंगलवार को पूर्व केंद्रीय मंत्री यशवंत सिन्हा को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया गया था. गिरफ्तारी के बाद उन्हें डेमोटांड स्थित कैंप जेल में रखा गया है, जहां वे पुलिस कार्रवाई के विरोध में अनशन पर बैठ गए थे. यशवंत ने पूरा दिन बिना कुछ खाए-पीए बिताया. भाजपा अलाकमान को अपनी मंशा जाहिर करने की यह आखिरी कोशिश थी. इन गतिविधियों से वह अलाकमान को अपनी मंशा जाहिर करना चाहते थे.

राजनीतिक महत्वाकांक्षा रखना बुरी बात नहीं
हाल के दिनों में नितिन गडकरी ने कुछ ऐसे बयान दिये. जो अमित शाह और मोदी के खिलाफ जाता था. गडकरी का बयान गंभीरता से लिया गया. क्योंकि वह पार्टी में स्वभाविक दावेदार हैं. वह प्रधानमंत्री मोदी के समकालीन पीढ़ी के नेता हैं. इसलिए उन्हें प्रधानमंत्री के विकल्प के रूप में देखा जाता है. सवाल यह कि यशवंत सिन्हा और अरुण शौरी के विचारों और कामकाज से आज की पीढ़ी कनेक्ट हो पायेगी ? क्या देश में नये लोगों को जगह नहीं मिलनी चाहिए.

दस साल बाद नरेंद्र मोदी नहीं रह सकते हैं प्रासंगिक
अरुण शौरी और यशवंत सिन्हा की भूमिका समझना हो तो आप दस साल बाद की परिस्थिति की कल्पना कर सकते हैं. जब कोई शख्स सत्ता संभाले और नरेंद्र मोदी उस शख्स के हर फैसले पर सवाल उठाये. यह भारत के अवसरवादिता राजनीति का चरित्र बयान करती है. जो सिर्फ भाजपा ही नहीं कांग्रेस में भी है.

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