रेप सीन के दौरान हिचक और डर रहे थे राजबब्‍बर, जीनत अमान ने बढ़ाई थी हिम्‍मत!

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पिछली बार मैंने आपातकाल में ‘टैलेंट कॉन्टेस्ट’ चुने जाने पर भी चयन की घोषणा न होने की पृष्ठभूमि के बारे में लिखा। अब वादे के मुताबिक़ पहले ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ पर लिखने के लिए मैंने याददाश्त पर भरोसा करने के बजाए मैंने फ़िल्म एक बार फिर देखी:

सबसे पहले पिछले दिनों आई ‘पिंक’ पर लिखते हुए दीपा गहलौत ने ‘इंसाफ़ का तराज़ू’ के बारे में लिखा:
[This week’s release Pink, directed by Aniruddha Roy Chowdhury, seeks to examine the patriarchal attitudes of society towards women who have suffered sexual violence.

The 1980 film Insaf Ka Tarazu, directed by BR Chopra, made exactly the same argument; the storyline was different, but there were a few points of convergence.

[It’s strange to see that in the interim 36 years, despite the progress women have made in so many ways, the archaic ideas of how “good” women should behave still remain.

Bharti (Zeenat Aman), the protagonist of Insaf Ka Tarazu, is a model and not coy around men. She has a boyfriend, Ashok (Deepak Parashar), so although she is friendly towards rich brat Ramesh (Raj Babbar), she does not encourage his romantic overtures.

[One day, when he is visiting her on the pretext of showing her pictures of a party he threw for her, she ignores him to take a call from Ashok. Stung, he rapes her brutally.
Instead of staying silent, Bharti decides to take Ramesh to court, in spite of being warned by her lawyer (Simi Garewal) that the process would be tough and humiliating.

[Like in Pink, where the character of the young woman who fended off molestation is questioned, in the older film too, Ramesh’s lawyer (Shreeram Lagoo) proves that a woman who models in skimpy clothing must be a slut, and that the act between the two was
consensual.Bharti’s terrified younger sister Neeta (Padmini Kolhapure), who briefly witnessed the rape, is manipulated into testifying against her.]

यह सही है कि नीता पर बलात्कार वाली घटना manipulated है, पर वह इसलिए ज़रूरी थी कि भारती बलात्कारी रमेश गुप्ता को गोली से मार सके और मुक़दमे में हमारी न्यायप्रणाली को ही कठघरे में खड़ा कर सके।

फ़िल्म शुरू होने से पहले छाया चित्रों (शैडो प्ले) में हम देखते हैं चार्ली चैपलिन की ‘मौंश्यू वेर्दौ (Monsieur Verdoux)’ और मृणाल सेन की ‘मृगया’ के नायक की तर्ज़ पर सैनिक अधिकारी धर्मेंद्र कहता है, “मैंने हत्या की है लेकिन ज़ुर्म नहीं किया है!”

फ़िल्म का मुख्य भाग शुरू होता है ब्यूटी कॉन्टेस्ट से। मॉडलिंग करने वाली आधुनिक लड़की भारती (ज़ीनत अमान) सर्वश्रेष्ठ चुनी जाती है। आडिएंस में बैठे नैजवान उद्योगपति रमेश गुप्ता की कामुक नजरें बार बार उस पर गड़ जाती हैँ। अब उसे बुलाया जाता है भारती को विजय मुकुट पहनाने के लिए। वह बड़ी बड़ी मीठी बातें करता है। भारती की नजर में वह बड़ा भलामानस बन जाता है।

अब हम देखते हैं रेस्तरां में भारती को छोटी बहन नीता (पद्मिनी कोल्हापुरे) और मंगेतर जैसा मित्र अशोक शर्मा (दीपक पाराशर) के साथ विजय का जश्न मनाते हुए। उन्हें देखकर रमेश गुप्ता भी कुछ देर के लिए उनके पास आता है और रेस्तरां वालों को आदेश देता है कि उन्हें उसका मेहमान माना जाए (यानी बिल उसके खाते में जोड़ा जाए)।

अगले ही दिन रमेश खुली छत वाली शानदार गाड़ी में कहीं जा रहा है। देखता है नीता बस की लाइन में खड़ी है। उसे लिफ़्ट देता है और भारती का जन्म दिन पूछ लेता है। वह भारती से मिलता जुलता रहता है। अपनी मॉडलिंग की शूटिंग देखने के लिए भारती ने रमेश को आमंत्रित किया। वहां भारती के अध उघड़ा बदन कई ऐंग्ल से क्या देखा कि मन ही मन मनसूबे बना लिए। बार बार उससे मिलता रहता है। कभी फूल देता है, और एक दिन बड़ा महंगा कंठहार हीन दे दिया। नानकुर करती भारती को जबरदस्ती उपहार थमा ही दिया।

भारती का जन्म दिन। अशोक शर्मा अपने माता-पिता से सगाई की बात करता है। वे ऐसी आधुनिक लड़की को बहू बनाना नहीं चाहते। भारती का जन्मदिन-रमेश उसके घर आ धमकता है। तभी अशोक शर्मा का टेलिफ़ोन आता है। उससे बात करती भारती अपने कमरे में जाती है तो रमेश वहां भी पहुंच जाता है। मौक़ा देख कर वह बलात्कार पर आमादा हो जाता है। भारती गिर पड़ती है। निर्देशक बी.आर. चोपड़ा हमें यह दृश्य हमारी भावनाओं को ठेस न पहुंचाने के लिए पलंग की आड़ में दिखाते हैं-
इसके फ़िल्मांकन के बारे में कहा जाता है, राज बब्बर फिल्मों में आए ही थे। जीनत अमान पर बलात्कार का दृश्य करते डर भी रहे थे और हिचक भी रहे थे। जीनत ने युक्ति निकाली। रेप सीन की कई बार रिहर्सल की और उन्हें समझाया कि शूट के दौरान वो जितना क्रूर बन सकते हैं बनें और ऐसे शूट करें कि रेप सीन असली लगे। सीन के मुताबिक़, राज ने जीनत के साथ खूब हाथापाई, मारपीट की, इधर-उधर फेंका, लेकिन जीनत ने उफ्फ तक नहीं, जबकि राज बब्बर का कलेजा मुंह को आ गया था। वैसे यह सीन यादगार माना जाता है। इसी की बदौलत राज एकदम शीर्ष कलाकारों में गिना जाने लगा।

बलात्कार हो ही रहा था कि अचानक छोटी बहन नीता स्कूल से आ गई। उसने इस का अंतिम अंश देखा।
भारती अशोक शर्मा से टेलिफ़ोन पर बात कर रही थी। कुछ आवाज़ें अशोक ने सुनीं। उसके घर पहुंचने तक रमेश जा चुका था।

आमतौर पर बलात्कृताएं बदनामी के डर से चुप्पी साध लेती हैं। भारती चुप रहने वाली नहीँ थी। उसने ठान लिया जो भी हो, कोई कितना ही टोके समझाए वह मामले को अंजाम तक ले जा कर रहेगी।

वकील सिमी (सिमी ग्रेवाल) ने साफ बात की। बताया कि भारती को समाज में तरह तरह की बातें सुनने को मिलेंगी। भारती टस से मस नहीं हुई। अब वकील सिमी पूरी तरह उस के साथ थी। उसने कहा, “औरत को ना कहने का हक है!” यह वाक्य आज तक दोहराया जाता है सोशल मीडिया पर। पर मानसिकता वही की वही है। पीड़ित महिलाएं अभी तक सम्मान की भागी नहीं होतीं।

पीड़ित भारती का अदालत तक जाने का साहस करना ‘इंसाफ़ का तराजू’ को हमारी फ़िल्मों के इतिहास में एक साहसिक फि‍ल्म थी और विषय के सशक्त फ़िल्मांकन के कारण हमेशा प्रशंसित होती रहेगी।

कहा जाए तो यहां तक का घटना चक्र फ़िल्म का उपोद्घात या विषय प्रवेश था। मुख्य भाग है मुक़दमा, जो सवाल को कई कोणों से दर्शक के सामने रखता है।

वकील मिस्टर चंद्रा (डॉक्टर श्रीराम लागू) बलात्कारी रमेश गुप्ता का बचाव कर रहा है। रमेश हवालात में है। वकील चंद्रा वादा करता है वह उसे बचा कर रहेगा। बहन नीता गवाह बनती है, लेकिन वकील चंद्रा के सामने ठहर नहीं पाती। तमाम दलीलें तमाम गवाहियां साबित कर देती हैं कि भारती पर दुष्कर्म नहीँ हुआ। हुआ तो वह उसमें सहभागी थी, अनिच्छुक नहीं थी। अदालत में सब दर्शक और सब वकील और स्वयं जज (इफ़्तेख़ार) समझ गए हैं कि दुष्कर्म हुआ था। विधि संहिता का पालन करने को विवश हैं। पापी रमेश बेदाग़ छूट जाता है। और कुछ हो भी नहीं सकता था।

भारती समाज में रहने की कोशिश करती है, तंग आकर डूब मरना चाहती है। लेकिन रमेश उसे रोक लेता है। लेकिन उसके घर वाले भारती को बहू बनाने को तैयार नहीं हैं। पिता अंतिम फ़ैसला सुनाते हैं, “इस लड़की को भूल जाओ।”

स्कूल में लड़कियां नीता को सताती हैं। भारती सांत्वना देती है। और तमाम तानों, कटाक्षों और पड़ोसिनों के आक्रामक तेवरों से तंग आ कर शहर बदलना तय कर लेती है। पुणे जाने वाली ट्रेन में दोनों बहनें बैठी हैँ। उन्हें रोकने रमेश आता है। पर बेकार।

वह बहन नीता को लेकर पुणे में रहने लगती है। टाइपिंग सीखती है। बंदूक आदि बेचने वाली दुकान में काम करने लगती है। नीता भी टाइपिंग सीख रही है। बहन का बोझ कम करने के लिए वह नौकरी के विज्ञापन के जवाब में जहां पहुंचती है वह उद्योगपति अशोक गुप्ता का दफ़्तर है। इंटरव्यू चल रहे हैं, समाप्त होते हैं।

आरंभिक चयन में जो उम्मीदवार हैं उनके फोटो लगे आवेदन पत्र लेकर मैनेजर बॉस के पास जाता है। अशोक की नजर नीता के फ़ोटो पर पड़ती है। उसे याद आती है उसके ख़िलाफ़ गवाही देती नीता। वह कहता इस लड़की को भेज दो। नीता आ गई है। अशोक बाहर जाने का दरवाज़ा बंद कर देता है। नीता को तंग करता एक एक कर के उस के कपड़े उतरवाता है। बलात्कार करता है। उधर भारती चिंतित है। एक पिस्तौल ले कर निकलती है।

अशोक कमरे से निकल चुका है। नीचे जाने वाली सीढ़ियों पर वह उसे मार देती है।

दो साल बाद एक बार फिर वह उसी अदालत में है। उस पर हत्या का आरोप है। राज बब्बर का वही वकील चंद्रा भारती को हत्यारा साबित करना चाहता है। पर भारती स्वयं कह रही है, हां मैं ने उसे मारा है। लेकिन मैंने उसे सजा दी है।

इस बार भारती रुकने वाली नहीं है। अपने तर्कों से वह क़ानून को अपराधी बना देती है। विधि संहिता के अनुसार कारण कोई भी हो हत्या तो हत्या ही है। जज साहब को तो उसे सजा देनी ही होगी। शर्मिंदा जज साहब उसे अदालत से उठने तक का दंड दे कर अपना त्यागपत्र दे देते हैं।

अंत को सुखांत बनाने के लिए रमेश का परिवार भारती को बहू स्वीकार कर लेता है।

[अरविंद कुमार: ‘माधुरी’ के संस्थापक-संपादक अरविंद कुमार से जीवनीपरक सिनेवार्ता]

[साभार: pictureplusonline.com फिक्‍चर प्‍लस]

…तो इसलिए फिल्मफेयर टैलेंट कॉन्टेस्ट के विजेता राज बब्बर का नाम घोषित नहीं किया गया

 

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