जीतन राम मांझी खुद के लिए परेशानी हैं या दोस्तों के लिए?

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file photo

 

पटना : जीतन राम मांझी एक बार फिर बिहार की राजनीति में चर्चा के केंद्र में हैं. वे चर्चा में इस वजह से हैं कि वे महागठबंधन के सीट बंटवारे के फार्मूले से संतुष्ट नहीं हैं. वे दिल्ली से बैठकों के सिलसिले को छोड़ कर वापस पटना आ गये. इस बीच तेजस्वी यादव का बयान आया कि अगर हम अलग-अलग लड़ेंगे तो जनता हमें माफ नहीं करेगी. जाहिर है उनका मायने जीतन राम मांझी से जुड़ा हुआ था.

इधर, जदयू के महासचिव आरसीपी सिंह ने साफ किया है कि एनडीए में उनके लिए जगह नहीं है. उन्होंने यहां तक कहा कि एनडीए में वेटिंग लाउंज नहीं है. जाहिर है ऐसा कह कर उन्होंने यह स्पष्ट कर दिया है कि अब एनडीए में उनके लिए जगह नहीं है.

मालूम हो कि जब जीतन राम मांझी एनडीए में थे तब भी उन्होंने पासवान से लेकर अमित शाह तक के लिए सीट बंटवारे के लिए ऐसे हालात बनाये थे. जाटिल राजनीतिक मुद्दों को सुलझाने वाले भाजपा अध्यक्ष अमित शाह बहुत मशक्कत कर और मिठाई खिलाकर जीतन राम मांझी को मनाना पड़ा था.

जीतन राम मांझी चाहते हैं कि उन्हें उपेंद्र कुशवाहा की रालोसपा से एक सीट अधिक मिले, नहीं तो कम से कम बराबर तो मिल ही जाये. रालोसपा को तीन सीटें जबकि मांझी को दो सीटें दी जा रही हैं. मांझी ने मुजफ्फरपुर सीट पर दावेदारी जतायी है, जहां से मल्लाह नेता मुकेश साहनी के चुनाव लड़ाने का महागठबंधन ने निर्णय लिया है.

एनडीए में भी जब मांझी ने अपनी जीत पर सीटें हासिल की थी तो वे उसे जीतने में विफल रहे थे. वे सहयोगी भाजपा को भी लाभ नहीं पहुंचा सके थे, अब वही हालात यहां पैदा कर रहे हैं. इससे सवाल यह उठता है कि मांझी अपने दोस्तों के लिए ही नहीं बल्कि खुद के लिए भी परेशानी हैं?

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